वर्तमान संकट को समझने के लिए, नेपाल की राजशाही से गणतंत्र तक की यात्रा को समझना ज़रूरी ह

- राजशाही (2008 तक): सदियों तक, नेपाल पर शाह राजवंश का शासन रहा। यह काल सामंती व्यवस्था वाला था और देश काफी हद तक अलग-थलग रहा। 1990 के दशक में एक संक्षिप्त बहुदलीय लोकतंत्र की स्थापना हुई, लेकिन राजशाही के पास अभी भी महत्वपूर्ण शक्तियाँ थीं।
- माओवादी विद्रोह: 1996 से 2006 तक, सरकार और माओवादी विद्रोहियों के बीच एक हिंसक गृह युद्ध चला, जो राजशाही को उखाड़ फेंककर एक कम्युनिस्ट गणतंत्र स्थापित करना चाहते थे। इस संघर्ष में 17,000 से अधिक लोग मारे गए और बड़े पैमाने पर लोग विस्थापित हुए।
- 2006 का जन आंदोलन II: सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के समर्थन वाले एक जन आंदोलन ने राजा ज्ञानेंद्र को अपना सीधा शासन समाप्त करने और संसद बहाल करने पर मजबूर किया। इसने राजशाही के अंत का मार्ग प्रशस्त किया।
- राजशाही का अंत और नया संविधान: 2008 में, राजशाही को समाप्त कर दिया गया और नेपाल को एक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया। देश ने 2015 में एक नया संविधान अपनाया, जिसने देश को सात प्रांतों में विभाजित किया और एक अधिक समावेशी राजनीतिक प्रणाली बनाने का लक्ष्य रखा।
हालाँकि राजशाही का अंत एक बड़ा कदम था, लेकिन इसने राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और आर्थिक ठहराव जैसी गहरी समस्याओं का समाधान नहीं किया।
वर्तमान अशांति के मूल कारण
हाल के विरोध प्रदर्शन विभिन्न लंबे समय से चली आ रही समस्याओं का परिणाम हैं।
- राजनीतिक अस्थिरता: 2008 से, नेपाल में 13 अलग-अलग सरकारें बनी हैं। नेतृत्व में बार-बार होने वाले बदलावों ने किसी भी दीर्घकालिक नीति के कार्यान्वयन को रोका है, जिससे देश लगातार संक्रमण की स्थिति में रहा है।
- गहराई से जड़ें जमा चुका भ्रष्टाचार: सरकार के सभी स्तरों पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। सार्वजनिक धन का अक्सर दुरुपयोग होता है, और कई राजनेताओं पर गबन और भाई-भतीजावाद के आरोप लगे हैं। हालिया “नेपो किड्स” घोटाला, जिसने राजनेताओं के बच्चों की आलीशान जीवनशैली को उजागर किया, सार्वजनिक गुस्से का एक प्रमुख कारण बना।
- आर्थिक संकट और बेरोजगारी: COVID-19 महामारी ने नेपाल की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया, जो पर्यटन और विदेशों में काम करने वाले नेपालियों द्वारा भेजी जाने वाली रकम पर बहुत अधिक निर्भर करती है। बेरोजगारी अधिक है, और लाखों युवा, शिक्षित नेपाली अन्य देशों में नौकरी खोजने को मजबूर हैं।
- शासन की विफलता: सरकार पर सार्वजनिक सेवाओं, जिसमें स्वास्थ्य सेवा और बुनियादी ढांचा शामिल है, के खराब प्रबंधन के लिए आलोचना की गई है। आम भावना यह है कि राजनीतिक अभिजात वर्ग अपने वादे पूरे करने में विफल रहा है और आम लोगों की समस्याओं से कटा हुआ है।
चिंगारी: सोशल मीडिया पर प्रतिबंध
बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों का तात्कालिक कारण सरकार का सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय था।
प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सरकार ने एक नया कानून लागू करने की कोशिश की, जिसके तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को नेपाल में पंजीकृत होना पड़ता। जब मेटा और एक्स (ट्विटर) जैसी कंपनियों ने इसका पालन नहीं किया, तो सरकार ने इन प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच अवरुद्ध कर दी।
इस कदम को व्यापक रूप से असंतोष को दबाने और सूचना के प्रवाह को नियंत्रित करने के प्रयास के रूप में देखा गया। युवा, जो सरकार की विफलताओं के बारे में सोशल मीडिया पर बहुत मुखर रहे हैं, उन्होंने इस प्रतिबंध को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला माना। इसने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया, जिनमें मुख्य रूप से ‘Gen Z’ (युवा पीढ़ी) शामिल थी।
विरोध प्रदर्शनों और उसके परिणामों का A to Z
पुलिस की कड़ी प्रतिक्रिया के कारण विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से शुरू हुए लेकिन जल्दी ही हिंसक हो गए।
- शुरुआती विरोध प्रदर्शन: हजारों युवा, जो एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप के माध्यम से संगठित हुए थे, काठमांडू और अन्य प्रमुख शहरों की सड़कों पर उतर आए। उन्होंने भ्रष्टाचार को समाप्त करने, राजनीतिक स्थिरता और प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग की।
- हिंसा का बढ़ना: जैसे-जैसे विरोध प्रदर्शन बढ़े, सुरक्षा बलों के साथ झड़पें अधिक बार होने लगीं। सरकार ने कर्फ्यू लगा दिया, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने इसका उल्लंघन किया। कई प्रमुख सरकारी भवनों में आग लगा दी गई, और राजनेताओं के आवासों पर भी हमले की खबरें आईं।
- सरकार का पतन: भारी जन दबाव और अपनी पार्टी के भीतर समर्थन की कमी का सामना करते हुए, प्रधानमंत्री ओली को इस्तीफा देना पड़ा। उनके इस्तीफे ने गठबंधन सरकार के पतन को चिह्नित किया और एक राजनीतिक शून्य पैदा कर दिया।
- वर्तमान स्थिति: संसद में कोई स्पष्ट बहुमत न होने के कारण, अभी तक नई सरकार का गठन नहीं हुआ है। प्रमुख शहरों में व्यवस्था बनाए रखने के लिए सेना तैनात की गई है, और एक अंतरिम सरकार पर विचार किया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों ने देश का अस्थायी रूप से नेतृत्व करने और नए चुनावों की देखरेख के लिए पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की और काठमांडू के मेयर बालेन शाह जैसे गैर-दलीय हस्तियों की एक परिषद का प्रस्ताव दिया है।
नेपाल का भविष्य क्या है?
वर्तमान स्थिति नेपाल के इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ है। इसका परिणाम दो दिशाओं में जा सकता है:
- नई शुरुआत: यदि राजनीतिक दल अपने मतभेदों को दूर कर एक स्थिर सरकार बना सकते हैं जो जनता की चिंताओं को दूर करे, तो यह संकट एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। भ्रष्टाचार से लड़ने और रोजगार सृजित करने के स्पष्ट जनादेश वाली सरकार सार्वजनिक विश्वास को बहाल कर सकती है।
- लगातार अस्थिरता: आगे बढ़ने का कोई स्पष्ट रास्ता न होने पर, राजनीतिक शून्य और अधिक अराजकता और संभावित संवैधानिक संकट को जन्म दे सकता है। यह राजनीतिक गुटों द्वारा शोषण का शिकार हो सकता है या कानून और व्यवस्था का पूर्ण विघटन भी हो सकता है।
नेपाल का भविष्य अब इसके राजनीतिक नेताओं की अपने नागरिकों, विशेषकर युवाओं की मांगों को सुनने की इच्छा पर निर्भर करता है, जिन्होंने दिखाया है कि वे अब यथास्थिति को सहन करने के इच्छुक नहीं हैं।